निराशा

एक बार एक आदमी कुँए पर पानी पी रहा था, तो उसे पानी पिलाने वाली बहन ने मजाक में कह दिया कि तेरे पेट में छोटी-सी छिपकली चली गयी । असल में एक छोटा पत्ता था, जो कुँए के पास लगे पेड़ से गिरा था । उस आदमी के दिमाग में यह बात बैठ गयी कि मेरे पेट में छिपकली चली गयी, अब मै ठीक होने वाला नहीं हूँ ।
उस व्यक्ति के परिजनों ने बहुत ईलाज करवाया, किन्तु वह किसी से भी ठीक नहीं हुआ । तब एक बहुत अनुभवी बृद्ध वैद्य ने उस व्यक्ति का पूरा इतिहास सुना और सुनने के बाद उस आदमी को कहा बेटा तू ठीक हो जायेगा, क्योकि अब छिपकली के निकलने का समय आ गया ।
वैद्य ने उस पानी पिलाने वाली बहन को कहा कि उस आदमी को उसी कुँए पर लाकर पुनः पानी पिलाना । जैसे ही वह व्यक्ति अंजलि बना कर पानी पीने बैठा तो पीछे से किसी ने उसे जोर का थप्पड़ लगाया और कहा कि देखो वह छिपकली निकल गयी । कितनी बड़ी होकर निकली । अगले दिन से वह आदमी धीरे-धीरे ठीक होने लगा । महीने भर बाद वह आदमी एकदम ठीक हो गया । न किसी ने छिपकली पेट में जाते देखी, न बाहर आते । इंसान का मन ऐसा हैँ कि यदि कोई बात बैठ गयी तो वह असंभव को भी संभव बना लेता हैँ ।
एक बार किसी व्यक्ति को निराश कर दीजिये, फिर वह कुछ करने योग्य नहीं रह जायेगा । भय का भूत आप खुद जागते हैँ, निराशा की राक्षसी को आप अपने अंदर खुद पैदा करते हैँ, चिंता की डायन कही और से नहीं आती, आपके अंदर से ही पैदा होती हैँ ।
इसलिये वेदों में एक स्थान पर आया हैँ कि मै इंद्र हूँ, राजा हूँ, किसी से हारने वाला नही हूँ ।स्वयं को स्वामी मानकर चलो, यह मानकर चलो कि आप किसी से पराजित नहीं हो सकते- न अपनी समस्याओ से, न बीमारियों से, न कष्टों से और न ही निराशाओ से ।

खुशी बांटो खुशी मिलेगी​

एक व्यक्ति ने एक नया मकान खरीदा ! उसमे एक फलों का बगीचा भी था , उसके पडौस का घर पुराना था और उसमे कई लोग भी रहते थे !
कुछ दिन बाद उसने देखा कि पडौस के घर से किसी ने बाल्टी भर कूड़ा , उसके घर के दरवाजे के सामने डाल दिया है !
शाम को उस व्यक्ति ने एक बाल्टी ली., उसमे अपने बगीचे के ताजे फल रखे और फिर पड़ौसी के दरवाजे की घंटी बजाई ! उस घर के लोगों ने जब झांककर देखा तो बेचैन हो गये और वो सोचने लगे कि …वह शायद उनसे सुबह की घटना के लिये लड़ने आया है ! अतः वे पहले से ही तैयार हो गये और बुरा – भला , सोचने लगे !
मगर जैसे ही उन्होने दरवाजा खोला , उन्होंने देखा – रसीले ताजे फलों की भरी बाल्टी के साथ चेहरे पर मुस्कान लिए नया पडोसी सामने खडा था…! अब सब हैरान – परेशान थे !
उसने अंदर आने की इजाजत मांग घुसते ही कहा – ” जो मेरे पास था , वही मैं आपके लिये ला सका ! ”
यह सच भी है इस जीवन में … जिसके पास जो है , वही तो वह दूसरे को दे सकता है.!
जरा सोचिये , कि आपके पास दूसरो के लिये क्या है..?

दाग तेरे दामन के धुले ना धुले . नेकी तेरी कही पर तुले ना तुले.!
मांग ले गल्तियों की माफी खुदा से , क्या पता ये आँख कल खुले ना खुले ?

​प्यार बांटो प्यार मिलेगा …खुशी बांटो खुशी मिलेगी​…

मित्र, कम चुनें, लेकिन नेक चुनें

एक बेटे के अनेक मित्र थे, जिसका उसे बहुत घमंड था.
उसके पिता का एक ही मित्र था, लेकिन था सच्चा.

एक दिन पिता ने बेटे को बोला कि तेरे बहुत सारे दोस्त है, उनमें से आज रात तेरे सबसे अच्छे दोस्त की परीक्षा लेते है.

बेटा सहर्ष तैयार हो गया. रात को 2 बजे दोनों, बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे.

बेटे ने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा नहीं खुला, बार-बार दरवाजा ठोकने के बाद दोनो ने सुना कि अंदर से बेटे का दोस्त अपनी माताजी को कह रहा था कि माँ कह दे, मैं घर पर नहीं हूँ.

यह सुनकर बेटा उदास हो गया, अतः निराश होकर दोनों घर लौट आए.

फिर पिता ने कहा कि बेटे, आज तुझे मेरे दोस्त से मिलवाता हूँ.

दोनों रात के 2 बजे पिता के दोस्त के घर पहुंचे. पिता ने अपने मित्र को आवाज लगाई. उधर से जवाब आया कि ठहरना मित्र, दो मिनट में दरवाजा खोलता हूँ.

जब दरवाजा खुला तो पिता के दोस्त के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी.
पिता ने पूछा, यह क्या है मित्र.
तब मित्र बोला....अगर मेरे मित्र ने दो बजे रात्रि को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर वह मुसीबत में होगा और अक्सर मुसीबत दो प्रकार की होती है, या तो रुपये पैसे की या किसी से विवाद हो गया हो.
अगर तुम्हें रुपये की आवश्यकता हो तो ये रुपये की थैली ले जाओ और किसी से झगड़ा हो गया हो तो ये तलवार लेकर मैं तुम्हारें साथ चलता हूँ.

तब पिता की आँखे भर आई और उन्होंने अपने मित्र से कहा कि, मित्र मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं, मैं तो बस मेरे बेटे को मित्रता की परिभाषा समझा रहा था।
ऐसे मित्र न चुने जो खुद गर्ज हो और आपके काम पड़ने पर बहाने बनाने लगे..!

अतः मित्र, कम चुनें, लेकिन नेक चुनें..

दु:ख का कारण है ईर्ष्या

एक जंगल में एक कौवा रहता था और वह अपनी जिंदगी से बहुत दुखी था। वह जब भी जंगल में घूमता तो दूसरे पक्षियों को देखता था और उन्हें देखकर उसे लगता की उसका रंग बहुत काला है और यही उसके दुख का असली कारण था। अब रोज का यही सिलसिला था तो वह कौवा उदास रहने लगा। एक दिन जब वह जंगल में उड़ रहा था तो उसने एक तालाब में बतख को तैरते देखा तो वह एक पेड़ में बैठ गया और सोचने लगा की यह बतख कितना सफ़ेद है। काश मेरा भी रंग सफ़ेद होता।
फिर कुछ देर बाद वह कौवा बतख के पास गया और उससे बोला – “तुम बहुत खुशकिस्मत हो जो तुम्हारा रंग सफ़ेद है” बतख ने कौवे की बात सुनी और उसके बाद वह कौवे से बोला- “हां मैं सफ़ेद तो हूं लेकिन जब मैं हरे रंग के तोते को देखता हूं तो मुझे अपने इस सफ़ेद रंग से गुस्सा आता है।”
बतख की बात सुनकर वह कौवा वहा से चला गया और कुछ समय बाद वह तोते के पास पहुंचा। कौवा तोते से बोला- “तुम्हारा रंग तो बहुत सुन्दर है तुमको यह देखकर बहुत अच्छा लगता होगा।” कौवे की बात सुनकर तोता बोला- “हां, मुझे लगता तो अच्छा है की मैं इतना सुंदर हूं लेकिन मैं सिर्फ हरा हूं और जब कभी भी मैं मोर को देख लेता हूं तो मुझे बहुत बुरा लगता है क्योंकि मोर बहुत खुबसूरत है और उसके पास बहुत सारे रंग है।”
कौवे को लगा यह बात भी सही है क्यों न अब मोर के पास ही चला जाय। वह कौवा जंगल में मोर को ढूढने लगा, किन्तु उसे मोर नहीं मिला फिर वह कुछ दिन बाद एक चिड़ियाघर में जा पहुंचा।
जहा उसे मोर दिख गया लेकिन मोर को देखने के लिए बहुत सारे लोगो की भीड़ जमा हुई थी तो कौवा उन लोगो के जाने का इंतजार करने लगा। जब वे सब लोग चले गये तो कौवा मोर के पास पहुंचा और मोर से बोला- वाह मोर, तुम तो सच में बहुत खुबसूरत हो, तभी सब तुम्हारी इतनी तारीफ करते है। तुमको तो खुद पर बहुत गर्व महसूस होता होगा।
कौवे की बात सुनकर मोर बड़े दुख के साथ बोला- “तुम्हारी बात बिल्कुल ठीक है पर मेरे अलावा इस दुनिया में कोई और दूसरा खुबसूरत पक्षी नहीं है इसलिए मैं यहाँ चिड़ियाघर में कैद हूं। यहां पर सब मेरी रखवाली करते है जिस कारण में कही भी नहीं जा सकता और अपने मन के मुताबिक कुछ भी नहीं कर सकता है। मैं भी काश तुम्हारी तरह कौवा होता तो मुझे भी कोई कैद करके नहीं रखता और मैं भी हमेशा तुम्हारी तरह खुले आसमान में जहा चाहो वहां घूमता रहता पर एक मोर के लिए यह सब मुमकिन नहीं।”
कौवे ने मोर की सारी बातें सुनी और फिर वहां से चला गया और सारी बात समझ गया। उसे इस बात का अहसास हो गया था कि सिर्फ वो ही नहीं बल्कि हर कोई उसकी तरह दुखी और परेशान है।
हम भी अपने जीवन में कई बार ऐसे हालात का सामना करते है जब हम दूसरे की ख़ुशी देखकर खुद को दूखी कर लेते है और हम बेवजह अपनी तुलना किसी और से करने लग जाते है और यह हमेशा हमारे दुख का कारण होता है।

सफलता का रहस्य

सफलता का रहस्य

एक आठ साल का लड़का गर्मी की छुट्टियों में अपने दादा जी के पास गाँव घूमने आया। एक दिन वो बड़ा खुश था, उछलते-कूदते वो दादाजी के पास पहुंचा और बड़े गर्व से बोला, ” जब मैं बड़ा होऊंगा तब मैं बहुत सफल आदमी बनूँगा। क्या आप मुझे सफल होने के कुछ टिप्स दे सकते हैं?”

दादा जी ने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया, और बिना कुछ कहे लड़के का हाथ पकड़ा और उसे करीब की पौधशाला में ले गए। वहां जाकर दादा जी ने दो छोटे-छोटे पौधे खरीदे और घर वापस आ गए।वापस लौट कर उन्होंने एक पौधा घर के बाहर लगा दिया और एक पौधा गमले में लगा कर घर के अन्दर रख दिया।

“क्या लगता है तुम्हे, इन दोनों पौधों में से भविष्य में कौन सा पौधा अधिक सफल होगा?”, दादा जी ने लड़के से पूछा। लड़का कुछ क्षणों तक सोचता रहा और फिर बोला, ” घर के अन्दर वाला पौधा ज्यादा सफल होगा क्योंकि वो हर एक खतरे से सुरक्षित है जबकि बाहर वाले पौधे को तेज धूप, आंधी-पानी, और जानवरों से भी खतरा है…”

दादाजी बोले, ” चलो देखते हैं आगे क्या होता है !”, और वह अखबार उठा कर पढने लगे।कुछ दिन बाद छुट्टियाँ ख़तम हो गयीं और वो लड़का वापस शहर चला गया।

इस बीच दादाजी दोनों पौधों पर बराबर ध्यान देते रहे और समय बीतता गया। ३-४ साल बाद एक बार फिर वो अपने पेरेंट्स के साथ गाँव घूमने आया और अपने दादा जी को देखते ही बोला, “दादा जी, पिछली बार मैं आपसे successful होने के कुछ टिप्स मांगे थे पर आपने तो कुछ बताया ही नहीं…पर इस बार आपको ज़रूर कुछ बताना होगा।”
दादा जी मुस्कुराये और लडके को उस जगह ले गए जहाँ उन्होंने गमले में पौधा लगाया था। अब वह पौधा एक खूबसूरत पेड़ में बदल चुका था। लड़का बोला, ” देखा दादाजी मैंने कहा था न कि ये वाला पौधा ज्यादा सफल होगा…”

“अरे, पहले बाहर वाले पौधे का हाल भी तो देख लो…”, और ये कहते हुए दादाजी लड़के को बाहर ले गए, बाहर एक विशाल वृक्ष गर्व से खड़ा था! उसकी शाखाएं दूर तक फैलीं थीं और उसकी छाँव में खड़े राहगीर आराम से बातें कर रहे थे।

“अब बताओ कौन सा पौधा ज्यादा सफल हुआ?”, दादा जी ने पूछा।
“…ब..ब…बाहर वाला!….लेकिन ये कैसे संभव है, बाहर तो उसे न जाने कितने खतरों का सामना करना पड़ा होगा….फिर भी…”, लड़का आश्चर्य से बोला।

दादा जी मुस्कुराए और बोले, “हाँ, लेकिन challenges face करने के अपने rewards भी तो हैं, बाहर वाले पेड़ के पास आज़ादी थी कि वो अपनी जड़े जितनी चाहे उतनी फैला ले, आपनी शाखाओं से आसमान को छू ले…बेटे, इस बात को याद रखो और तुम जो भी करोगे उसमे सफल होगे- अगर तुम जीवन भर safe option choose करते हो तो तुम कभी भी उतना नहीं grow कर पाओगे जितनी तुम्हारी क्षमता है, लेकिन अगर तुम तमाम खतरों के बावजूद इस दुनिया का सामना करने के लिए तैयार रहते हो तो तुम्हारे लिए कोई भी लक्ष्य हासिल करना असम्भव नहीं है! लड़के ने लम्बी सांस ली और उस विशाल वृक्ष की तरफ देखने लगा…वो दादा जी की बात समझ चुका था, आज उसे सफलता का एक बहुत बड़ा सबक मिल चुका था!

दोस्तों, भगवान हमें एक meaningful life जीने के लिए बनाया है। But unfortunately, अधिकतर लोग डर-डर के जीते हैं और कभी भी अपने full potential को realize नही कर पाते। इस बेकार के डर को पीछे छोडिये…ज़िन्दगी जीने का असली मज़ा तभी है जब आप वो सब कुछ कर पाएं जो सब कुछ आप कर सकते हैं…वरना दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ तो कोई भी कर लेता, इसलिए हर समय play it safe के चक्कर में मत पड़े रहिये…जोखिम उठाइए… risk लीजिये और उस विशाल वृक्ष की तरह अपनी life को large बनाये… ….????

सफल जीवन के सूत्र

?1. जीवन
जब तुम पैदा हुए थे तो तुम रोए थे जबकि पूरी दुनिया ने जश्न मनाया था। अपना जीवन ऐसे जियो कि तुम्हारी मौत पर पूरी दुनिया रोए और तुम जश्न मनाओ।

?2. कठिनाइयों
जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते|

?3. असंभव
इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं| हम वो सब कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने नहीं सोचा|

?4.हार ना मानना
बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है|

?5.हार जीत
सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है|

?6.आत्मविश्वास
अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है

✍7. महानता
महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि हर बार गिरकर उठ जाने में है|

?8.गलतियां
अगर आप समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते है तो आप एक और गलती कर बैठते है| आप अपनी गलतियों से तभी सीख सकते है जब आप अपनी गलतियों को स्वीकार करते है|

?9.चिन्ता
अगर आप उन बातों एंव परिस्थितियों की वजह से चिंतित हो जाते है, जो आपके नियंत्रण में नहीं तो इसका परिणाम समय की बर्बादी एवं भविष्य पछतावा है|

?10. शक्ति
ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं| वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है|

?11. मेहनत
हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी|

?12. सपने
सपने वो नहीं है जो हम नींद में देखते है, सपने वो है जो हमको नींद नहीं आने देते।

?13. समय
आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास समय नहीं है क्योंकि आपको भी दिन में उतना ही समय (24 घंटे) मिलता है जितना समय महान एंव सफल लोगों को मिलता है|

?14. विश्वास
विश्वास में वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है| विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को भी पत्थर दिल बना सकता है|

?16. सफलता
दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते है|

?17. सोच
बारिश की दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते है लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही avoid कर देते है। समस्याए common है, लेकिन आपका नजरिया इनमे difference पैदा करता है।

?18.प्रसन्नता
यह पहले से निर्मित कोई चीज नहीं है..ये आप ही के कर्मों से आती है



?जिस प्रकार कमजोर नीव पर ऊँचा मकान खड़ा नहीं किया जा सकता ठीक इसी प्रकार यदि विचारो में उदासीनता, नैराश्य अथवा कमजोरी हो तो जीवन की गति कभी भी उच्चता की ओर नहीं हो सकती।

?निराशा का अर्थ ही लड़ने से पहले हार स्वीकार कर लेना है और एक बात याद रख लेना निराश जीवन मे कभी भी हास (प्रसन्नता) का प्रवेश नही हो सकता और जिस जीवन में हास ही नहीं उसका विकास कैसे संभव हो सकता है ?

?जीवन रूपी महल में उदासीनता और नैराश्य ऐसी दो कच्ची ईटें हैं, जो कभी भी इसे ढहने अथवा तबाह करने के लिए पर्याप्त हैं। अतः आत्मबल रूपी ईट जितनी मजबूत होगी जीवन रूपी महल को भी उतनी ही भव्यता व उच्चता प्रदान की जा सकेगी।


बदले की भावना केवल आपके  समय को ही नष्ट नहीं करती अपितु आपके स्वास्थ्य को भी नष्ट कर जाती है। अत: प्रयास जरूर करो मगर बदला लेने का नहीं अपितु स्वयं को बदल डालने का।

?  राधे राधे- ?

?      किसी से बदला लेने का नहीं अपितु स्वयं को बदल डालने का विचार ज्यादा श्रेष्ठ है।महत्वपूर्ण यह नहीं कि दूसरे आपको गलत कहते हैं अपितु यह है कि आप गलत नहीं करते हैं।
?       बदले की आग दूसरों को कम, स्वयं को ज्यादा जलाती है। बदले की आग उस मसाल की तरह है जिसे दूसरों को खाक करने से पहले स्वयं को राख होना पड़ता है। इसीलिए सहनशीलता के शीतल जल से जितना जल्दी हो सके इस आग को भड़कने से रोकना ही बुद्धिमत्ता है।
?  राधे राधे- ?

सीखने के प्रतिपल

सीखने के प्रतिपल 
सीखने के प्रतिपल कक्षा-1
सीखने के प्रतिपल कक्षा-2
सीखने के प्रतिपल कक्षा-3
सीखने के प्रतिपल कक्षा-4
सीखने के प्रतिपल कक्षा-5 

अनजाने कर्म का फल

??????????? एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था । राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था । उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी ।
तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला । तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई । किसी को कुछ पता नहीं चला ।
फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी । अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ ।
ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा …. ??? (1) राजा …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है ….
या (2 ) रसोईया …. जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है ….
या (3) वह चील …. जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी ….
या (4) वह साँप …. जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला ….
बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका (Pending) रहा ….
फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा । उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि “देखो भाई ….जरा ध्यान रखना …. वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है ।”
बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला (decision) ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा । यमराज के दूतों ने पूछा – प्रभु ऐसा क्यों ??
जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका (role) भी नहीं थी । तब यमराज ने कहा – कि भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं । पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला …. ना ही उस रसोइया को आनंद मिला …. ना ही उस साँप को आनंद मिला …. और ना ही उस चील को आनंद मिला ।
पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला । इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा ।
बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से (बुराई) करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं ।
अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया …. ??
ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं ….

 बड़ी सोच

एक बार एक आदमी ने देखा कि एक गरीब फटेहाल बच्चा बड़ी उत्सुकता से उसकी महंगी ऑडी कार को निहार रहा था। गरीब बच्चे पर तरस खा कर अमीर आदमी ने उसे अपनी कार में बैठा कर घुमाने ले गया।

लड़के ने कहा : साहब आपकी कार बहुत अच्छी है, यह तो बहुत कीमती होगी न…।

अमीर आदमी ने गर्व से कहा : हां, यह लाखों रुपए की है।गरीब लड़का बोला : इसे खरीदने के लिए तो आपने बहुत मेहनत की होगी? अमीर आदमी हंसकर बोला : यह कार मुझे मेरे भाई ने उपहार में दी है। गरीब लड़के ने कुछ सोचते हुए कहा : वाह! आपके भाई कितने अच्छे हैं।

अमीर आदमी ने कहा : मुझे पता है कि तुम सोच रहे होंगे कि काश तुम्हारा भी कोई ऐसा भाई होता जो इतनी कीमती कार तुम्हे गिफ्ट देता!! गरीब लड़के की आंखों में अनोखी चमक थी, उसने कहा : नहीं साहब, मैं तो आपके भाई की तरह बनना चाहता हूं…

सार :अपनी सोच हमेशा ऊंची रखो, दूसरों की अपेक्षाओं से कहीं अधिक ऊंची, तो तुम्हें बड़ा बनने से कोई रोक नहीं सकता।

संस्कार(Ritual)

एक राजा के पास सुन्दर घोडी थी । कई बार युद्व में इस घोडी ने राजा के प्राण बचाये और घोडी राजा के लिए पूरी वफादार थी कुछ दिनों के बाद इस घोडी ने एक बच्चे को जन्म दिया, बच्चा काना पैदा हुआ पर शरीर हष्ट पुष्ट व सुडौल था । बच्चा बडा हुआ बच्चे ने मां से पूछा मां मैं बहुत बलवान हूँ पर काना हूँ यह कैसे हो गया इस पर घोडी बोली बेटा जब में गर्भवती थी तू पेट में था तब राजा ने मेरे उपर सवारी करते समय मुझे एक कोडा मार दिया जिसके कारण तू काना हो गया । यह बात सुनकर बच्चे को राजा पर गुस्सा आया और मां से बोला मां मैं इसका बदला लूंगा । मां ने कहा राजा ने हमारा पालन – पोषण किया है तू जो स्वस्थ है सुन्दर है उसी के पोषण से तो है , यदि राजा को एक बार गुस्सा आ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है की हम उसे क्षति पहुचाये पर उस बच्चे के समझ में कुछ नहीं आया उसने मन ही मन राजा से बदला लेने की सोच ली । एक दिन यह मौका घोडे को मिल गया राजा उसे युद्व पर ले गया । युद्व लडते – लडते राजा एक जगह घायल हो गया घोडा उसे तुरन्त उठाकर वापिस महल ले आया । इस पर घोडे को ताज्जूब हुआ और मां से पूछा मां आज राजा से बदला लेने का अच्छा मौका था पर युद्व के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही ले पाया , मन ने गवाही नहीं दी इस पर घोडी हंस कर बोली बेटा तेरे खून में, तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं, तू जानकर धोखा दे ही नहीं सकता है । तुझसे नमक हरामी हो नहीं सकती क्योकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है । बाकई यह सत्य है जैसे हमारे संस्कार होते है बैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है हमारे पारिवारिक संस्कार अवचेतन मस्तिष्क में गहरे वैठ जाते है माता पिता जिस संस्कार के होते है उनके बच्चे भी उसी संस्कारों को लेकर पैदा होते है । हमारे कर्म ही संस्कार बनते है और संस्कार ही प्रारब्धो का रूप लेते है ! यदि हम कर्मो को सही व वेहतर दिशा दे दे तो संस्कार अच्छे बनेगें और संस्कार अच्छे बनेंगे तो जो प्रारब्ध का फल बनेगा वह मीठा व स्वादिष्ट होगा । हमें प्रतिदिन कोशिश करनी होगी की हमसे जानकर कोई धोखा न हो, गलत काम न हो, चिटिंग न हो । बस स्थिति अपने आप ठीक होती जायेगी ।