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पात्रता सूची

वरिष्ठ अध्यापक सामान्य संशोधित वरिष्ठता सूची 2020-21 अजमेर संभाग

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रामायण

1-राजा जनक का मूल नाम क्षीर ध्वज था उनके छोटे भाई कुशध्वज थे ! सीता जनक पुत्री थी सीता भूमिजा थी ! सीता की माता का नाम सुनेत्रा सुनयना था सुनयना की पुत्री उर्मिला थी सीता और उर्मिला का विवाह क्रमश दशरथ नन्दन राम लक्ष्मण के साथ हुआ ! कुशध्वज की दो पुत्रियां मांडवी श्रुतिकीर्ति का विवाह क्रमश भरत शत्रुघ्न जी के साथ हुआ !
रामजी के एक बहिन भी थी जिसका नाम शान्ता था शान्ता दशरथ कौशल्या की सन्तान थी ! अंग देश के राजा रोमपद कौशल्या की बड़ी बहिन वर्षिणी ने जो शान्ता की काकी थी ने गोद लिया था ! बाद में ऋषि श्रंग के साथ शान्ता का विवाह हुआ और ऋषि श्रंग ने ही राजा दशरथ का पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था !

2-श्रीजानकीजयन्ती पुण्यावसरे

श्रीजानकीचरितम्
———————-

वैशाखस्य सिते तिथिर्हि नवमी
त्रेतायुगे पावना
यज्ञार्थं खलु शोधिता वसुमती
राजर्षिणा धीमता।
फालेनैव यदा हलस्य जनकः
सीरध्वजः कर्षति
साश्चर्यो नृपतिः प्रजा मुनिजनाः
पश्यन्ति दिव्यं शिशुम्(1)

त्रेतायुग में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पवित्र नवमी तिथि थी । बुद्धिमान् राजर्षि जनक ने यज्ञ के लिए भूमि का शोधन किया । सीरध्वज जनक ने हल के फाले से जोतना शुरु किया, तभी आश्चर्य चकित राजा जनक, समस्त प्रजा और मुनियों ने एक दिव्य शिशु को देखा।

दिव्यं तं स्तनपं विलोक्य जनकः
सीरध्वजो हर्षितः
कन्येयं तनया नयामि भवने
साक्षी स्वयं शङ्करः।
वैदेही च यतो विदेहतनया
सीता तथा सीतया
कन्या साब्धिसुतेन्दिरावतरणं
नूनं जगद्धेतवे।।(2)

उस दुधमुंहे शिशु को देखकर सीरध्वज राजर्षि जनक बहुत खुश हुए । यह कन्या मेरी पुत्री है, इसे मैं अपने महल में ले जा रहा हूं , इस बात के साक्षी स्वयं भगवान शंकर हैं। विदेहपुत्री होने के कारण उसका नाम वैदेही हुआ तथा सीता अर्थात हल के फाले से बनी रेखा ( खूड ) से पैदा होने के कारण सीता नाम पड़ा । यह कन्या साक्षात सिन्धुसुता लक्ष्मी का अवतार थी। अवश्य ही इसका अवतरण लोक कल्याण के लिए हुआ था ।

बाल्ये कालगते यदा हि तनया
संवत्सरे पञ्चमे
एकेनैव करेण खण्डपरशो-
रुत्थापितं तद्धनुः।
पुत्री मे वसुधासुता बलवती
राजर्षिणा निश्चितं
भर्ता ते स भविष्यतीति दुहितः
शम्भोः धनुर्भञ्जकः।।(3)

बचपन में जब यह कन्या पाँच वर्ष की थी, इसने एक ही हाथ से भगवान् शिव का धनुष उठा लिया था । यह देखकर राजा ने निश्चय किया —मेरी पुत्री वसुन्धरा पृथ्वी की बलवती पुत्री है, अतः हे पुत्री ! जो भगवान् शिव के इस धनुष को तोड़ेगा, वही तुम्हारा पति होगा।

रामो दाशरथी पुराणपुरुषः
श्रीजानकीवल्लभः
सीता गच्छति कानने हि पतिना
रामेण साकं सती।
लङ्केशेन हृता निशाचरपती
रामेण वै हन्यते
हेतुर्यातुविनाशने भगवती
नौमि श्रीरामप्रियाम्।।(4)

कालान्तर में दशरथ पुत्र पुराणपुरुष श्री राम सीता जी के पति हुए । सती सीता अपने पति श्रीराम के साथ वन वास में चली गई । वहां लंकापति रावण ने इनका हरण कर लिया । परिणाम स्वरूप श्रीराम ने राक्षस राज रावण का वध कर दिया । इस प्रकार भगवती सीता राक्षसों के विनाश का कारण बनी। ऐसी श्रीराम प्रिया सीता जी को मैं प्रणाम करता हूं।

सीतायाः चरितं पुण्यं
नित्यं पठन्ति ये जनाः।
इहलोके सुखं प्राप्य
प्राणान्ते श्रीपतेः पदम्।।(5)

 

सीता जी का धरती में समाना

वाल्मीकि रामायण में वर्णन आता है कि रामजी अंतिम यज्ञ नैमिषार्णय में किया. अयोध्या के पास यह नैमिषार्णय है. नैमिषार्णय यात्रा जिन वैष्णवों ने कि होगी उनको विदित होगा कि वह एक जानकी कुण्ड है. वह के साधू ऐसा बतलाते है कि श्री सीता माता इसी धरती में समायी है. और इनके स्मारक-स्वरूप इस कुण्ड का नाम जानकी कुण्ड है. माता जी यही लीन हुई है

श्री रामचंद्र जी के यज्ञ का निमन्त्रण वाल्मीकि जी को भी गया

वाल्मीकि ऋषि कि बहुत इच्छा थी कि किसी भी प्रकार से रामजी मान जाये और सीता जी को घर में रखे. श्री सीतारामजी सुवर्ण-सिंहासनपर एक साथ विराजे और मै दर्शन करू. मै रामजी को समझाऊंगा , रामजी को उलाहना दूंगा, बहुत दिन हो गए. अब मुझे यह रहस्य सभा में प्रकट करना है.

एक दिन दरबार भरा हुआ था. उस दरबार में महर्षि वाल्मीकि जी ने शपथ सहित वचन कहे

बहु वर्ष सहस्त्राणि तपश्चर्या मया कृता
मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्व न किल्बिषम्

साठ हजार वर्ष तक मैंने तपश्चर्या कि है. मन, वाणी अथवा कर्म से मैंने कोई पाप नहीं किया. एक दिन भी मैंने झूंठ नहीं बोला. मै प्रतिज्ञापूर्वक कहता हु कि सीता जी महान पतिव्रता है. सीता जी अति पवित्र, शुद्ध एवं निर्दोष है

आज ऋषि ने सभा में प्रकट किया कि श्री सीताजी मेरे आश्रम में है. रामराज्य में प्रजा बहुत सुखी है. जितना महान सुख रामराज्य में तुमको मिलता है, उतना स्वर्ग के देवताओं को भी नही मिलता परन्तु लोगो को धिक्कार है कि ऐसे श्री रामजी के सुख का तनिक भी विचार नहीं करते. जिन रामजी के राज्य में इतना महान सुख तुमको मिला है, उन रामजी कि क्या स्थिति है? अकेले श्रीराम जी राजमहल में रहते है, अकेली सीताजी मेरे आश्रम में है. यह तुम लोगो से कैसी सहन किया जा रहा है? तुम्हारी सेवा जैसी श्री रामचन्द्र जी ने कि है वैसी किसी राजा ने अपनी प्रजा कि सेवा नहीं कि. तुम्हारी आराधना के लिए ही रामजी ने निर्दोष सीताजी का भी त्याग किया

आज मै प्रतिज्ञापूर्वक कहता हु कि सीताजी महान पतिव्रता न हो तो मेरी साठ हजार वर्ष कि तपस्या व्यर्थ हो जाए श्री सीताजी महान पतिव्रता ना हो तो मै नर्क में पडू, मेरी दुर्गति हो

श्री सीताजी का स्मरण हुआ और ऋषि वाल्मीकि का ह्रदय द्रवीभूत हो गया. उन ऋषि ने श्रीसीताजी का बहुत बखान किया और अयोध्या कि प्रजा को बहुत उलाहना दिया. वे आवेश में आकर बोलने लगे.

आयोध के लोग कैसे है मुझे खबर नहीं पड़ती. लोगो को लज्जा भी नहीं आती. ये लोग मनुष्य ये या राक्षस? को विचार ही नहीं करता. तुमलोग रामजी को क्यों नहीं कहते कि माताजी को जल्दी घर में पधराओ, नहीं तो हम अन्न-जल छोड़कर प्राण त्याग करते है

आज तो बोलते-बोलते ऋषि ने रामजी को भी उलाहना दिया, रामजी को भी बहुत सुनाई, इन्होने रामजी से कहा, तुम्हारा अन्य सभी कुछ ठीक है परन्तु तुमने श्री सीताजी का त्याग किया यह बहुत बुरा किया है ..

मुझको यह सहन नहीं होता. मेरी बहुत भावना है कि श्रीसीताजी के साथ आप सुवर्णसिंहासन पर आप विराजो और मै दर्शन करू. मुझे दक्षिणा में और कुछ भी नहीं माँगना, केवल इतना ही माँगना है. वे मेरी कन्या महान पतिव्रता है ऋषि बहुत आवेश में बोलने लगे. उस समय रामजी सिंहासन से उठकर दौड़ते हुए आये और वाल्मीकि जी के चरण पकडे और ऋषि के चरणों में माथा नवाया. कहा मै जानता हु के वे महान पतिव्रता है, निर्दोष है, परन्तु गुरूजी! मै क्या करू, मेरा दोष नहीं. अयोध्या के लोग चाहे जैसा बोलते है. कितनो ही के मन में शंका है, लंका में उन्हों ने अग्नि में प्रवेश किया था, परन्तु अयोध्या की प्रजा को विश्वास नहीं आता

मेरे चरित्र के विषय में लोगो को शंका होती है. प्रजा को शुद्ध चरित्र का आदर्श बताने के लिए मेरी इच्छा न होते हुए भी मैंने त्याग किया है. सीताजी की पवित्रता का मुझे तो विश्वास है परन्तु अयोध्या के लोगो को विश्वास होना चाहिए, मेरी बहुत इच्छा है के एक बार सीता जी दरबार में पधारे और अयोध्या की प्रजा को विश्वास हो सके, ऐसा कोई उपाए बतावे. उसके पश्चात् मै सीताजी को घर में लाऊ

वाल्मीकि जी आश्रम में आते है और सीताजी को समझाते है बेटी! आज रामजी के साथ बहुत बाते हुई और प्रभु ने ऐसा कहा है कि मेरी बहुत इच्छा है कि एक बार वे दरबार में आवे. बेटी! तुम जाओगी तो मै तुम्हारे साथ रहूँगा.

ऋषि सीताजी को समझाते है. सीताजी बहुत व्याकुल हुई. उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर कहा. पतिदेव कि आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है. प्रभु ने मेरा त्याग किया, यह योग्य था और आज मुझे दरबार में बुलाते है. यह भी योग्य है. ये जो कुछ भी करते है. वह सब हो योग्य है. उनकी इच्छा है तो मै दरबार में आउंगी. वाल्मीकि जी रामचंद्र जी के पास आये और उन्हों ने कहा कि महाराज श्रीसीताजी दरबार में पधारेंगी. इसके लिए दिन निश्चित हो गया.

नियत दिन पर भारी दरबार भरा हुआ है. देवता और ऋषि दरबार आये हुए है. अयोध्या कि प्रजा दौड़ रही है. सभी को सीताजी का प्रभाव देखने कि इच्छा है

वाल्मीकि जी सीताजी को दरबार में लेकर आते है. श्रीसीता माँ , वाल्मीकि जी के पीछे पीछे चल रही है. नजर धरती पर है. श्री सीताजी माँ किसी पर दृष्टि डालती नहीं. माँ ने दोनों हाथ जोड़ रखे है. वे जगत को वन्दन कर रही है .. :'(

माँ ने काषाय वस्त्र पहन रखे है सौभाग्य – अलकार के आलावा दूसरा कोई श्रृंगार नहीं है. श्रीराम के वियोग में सीता जी ने अनाज का सेवन किया नहीं है. इससे माँ का श्रीअंग अतिशय दुर्बल दीख पड़ते है. लव – कुश पीछे पीछे चल रहे है

अयोध्या के प्रजा सीताजी का दर्शन करती है. श्री सीता माँ का दर्शन करते करते सब रोने लग गए. श्री सीता माँ का जय – जयकार करने लगे.

सिंहासन पर श्रीरामचन्द्रजी विराजे हुए है. श्रीसीताजी उनका वन्दन करती है. उसके पश्चात् सीता माँ शपथ लेते हुए धरती पर नजर रख कर माँ बोली

पतिव्रता-धर्म का मैंने बराबर पालन किया हो, आचरण , वाणी और विचार से सदा-सर्वदा श्रीरामजी का है चिन्तन किया हो., यह सब जो मैंने कहा , वह सत्य हो तो हे धरती माँ!, मुझे अपनी गोद में स्थान दो , अब तो मुझे मार्ग दो, मुझे अब इस जगत में रहना नहीं है ..

सीता माँ के मुख से ज्यो ही ये शब्द निकले, वही पर एकाएक धडाका हुआ, धरती फट गई, शेषनाग के फन के ऊपर सुवर्ण का सिंहासन बहार आया, श्री भूदेवी ने श्रीसीता माँ को उठा कर सिंहासन पर बैठाया और कहा. पुत्री यह जगत अब तुम्हारे रहने योग्य नहीं. लोगो को सम्मान देना आता ही नहीं. सिंहासन पर ज्यो ही श्री सीताजी विराजी, लव-कुश घबरा कर दौड़ते आये. हमारी माँ कहा जाती है? सात-आठ वर्ष के बालक है. माँ ने बलैया ली और कहा – ‘बेटा! राजा राम तुम्हारे पिता है. तुम अब अपने पिता कि सेवा करना, तुम्हारी माँ जाती है’

सब देखते ही रह गए. एक क्षण में सिंहासन के साथ श्री सीताजी आद्र्श्य हो गयी, धरती में लीन हो गई. पीछे तो अयोध्या के लोग बहुत विलाप करते है. श्रीराम आनन्द रूप है परन्तु सीताजी के वियोग में उन्हों ने भी विलाप किया है

श्री सीताजी का चरित्र अति दिव्या है, उनकी प्रत्येक लीला दिव्या है, श्री सीताजी का जनम दिव्या , श्री सीताजी का जीवन दिव्या और श्री सीता जी कि शेष लीला भी दिव्या है, श्री सीताजी के समान महान पतिव्रता स्त्री इस जगत में कोई नहीं है. भविष्य में होगी भी नहीं

परंतु वामपंथी विचारधारा की जनता कभी किसी की नहीं हुई , भगवान राम के समय भी नही और अब भी नही ।।
जय सीताराम🙏

 

रावण के गुण…

रावण मे कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। ऐसा माना जाता हैं कि रावण शंकर भगवान का बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था।

वाल्मीकि उसके गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं

अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:।
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥
आगे वे लिखते हैं “रावण को देखते ही राम मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्वलक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।”

रावण दुष्ट था और पापी था | शास्त्रों के अनुसार वह किसी भी स्त्री को स्पर्श नहीं कर सकता बगैर उसकी इच्छा के, अगर वह ऐसा करेगा तो वह जल कर भस्म हो जाएगा | इसी कारण वह सीताजी को छू तक नहीं पाया |

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं।

बौद्धिक संपदा का संरक्षणदाता : रावण…

रावण के ही प्रसंग में श्रीकृष्ण जुगनू का अभिमत है- “…..लंकापति रावण पर विजय का पर्व अकसर यह याद दिलाता है कि रावण की सभा बौद्धिक संपदा के संरक्षण की केंद्र थी। उस काल में जितने भी श्रेष्‍ठजन थे, बुद्धिजीवी और कौशलकर्ता थे, रावण ने उनको अपने आश्रय में रखा था। रावण ने सीता के सामने अपना जो परिचय दिया, वह उसके इसी वैभव का विवेचन है। अरण्‍यकाण्‍ड का 48वां सर्ग इस प्रसंग में द्रष्‍टव्‍य है।

उस काल का श्रेष्‍ठ शिल्‍पी मय, जिसने स्‍वयं को विश्‍वकर्मा भी कहा, उसके दरबार में रहा। उसकाल की श्रेष्‍ठ पुरियों में रावण की राजधानी लंका की गणना होती थी – यथेन्‍द्रस्‍यामरावती। मय के साथ रावण ने वैवाहिक संबंध भी स्‍थापित किया। मय को विमान रचना का भी ज्ञान था। कुशल आयुर्वेदशास्‍त्री सुषेण उसके ही दरबार में था जो युद्धजन्‍य मूर्च्‍छा के उपचार में दक्ष था और भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली सभी ओषधियों को उनके गुणधर्म तथा उपलब्धि स्‍थान सहित जानता था। शिशु रोग निवारण के लिए उसने पुख्‍ता प्रबंध किया था। स्‍वयं इस विषय पर ग्रंथों का प्रणयन भी किया।

श्रेष्‍ठ वृक्षायुर्वेद शास्‍त्री उसके यहां थे जो समस्‍त कामनाओं को पूरी करने वाली पर्यावरण की जनक वाटिकाओं का संरक्षण करते थे – सर्वकाफलैर्वृक्षै: संकुलोद्यान भूषिता। इस कार्य पर स्‍वयं उसने अपने पुत्र को तैनात किया था। उसके यहां रत्‍न के रूप में श्रेष्‍ठ गुप्‍तचर, श्रेष्‍ठ परामर्शद और कुलश संगीतज्ञ भी तैनात थे। अंतपुर में सैकड़ों औरतें भी वाद्यों से स्‍नेह रखती थीं।

उसके यहां श्रेष्‍ठ सड़क प्रबंधन था और इस कार्य पर दक्ष लोग तैनात थे तथा हाथी, घोड़े, रथों के संचालन को नियमित करते थे। वह प्रथमत: भोगों, संसाधनों के संग्रह और उनके प्रबंधन पर ध्‍यान देता था। इसी कारण नरवाहन कुबेर को कैलास की शरण लेनी पड़ी थी। उसका पुष्‍पक नामक विमान रावण के अधिकार में था और इसी कारण वह वायु या आकाशमार्ग उसकी सत्‍ता में था : यस्‍य तत् पुष्‍पकं नाम विमानं कामगं शुभम्। वीर्यावर्जितं भद्रे येन या‍मि विहायसम्।

उसने जल प्रबंधन पर पूरा ध्‍यान दिया, वह जहां भी जाता, नदियों के पानी को बांधने के उपक्रम में लगा रहता था : नद्यश्‍च स्तिमतोदका:, भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्‍ठामि चरामि च। कैलास पर्वतोत्‍थान के उसके बल के प्रदर्शन का परिचायक है, वह ‘माउंट लिफ्ट’ प्रणाली का कदाचित प्रथम उदाहरण है। भारतीय मूर्तिकला में उसका यह स्‍वरूप बहुत लोकप्रिय रहा है। बस…. उसका अभिमान ही उसके पतन का कारण बना। वरना नीतिज्ञ ऐसा कि राम ने लक्ष्‍मण को उसके पास नीति ग्रहण के लिए भेजा था, विष्‍णुधर्मोत्‍तरपुराण में इसके संदर्भ विद्यमान हैं।”

रावण के अवगुण…

वाल्मीकि रावण के अधर्मी होने को उसका मुख्य अवगुण मानते हैं। उनके रामायण में रावण के वध होने पर मन्दोदरी विलाप करते हुए कहती है, “अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का जहाँ तहाँ से हरण करने वाले! आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।” तुलसीदास जी केवल उसके अहंकार को ही उसका मुख्य अवगुण बताते हैं। उन्होंने रावण को बाहरी तौर से राम से शत्रु भाव रखते हुये हृदय से उनका भक्त बताया है। तुलसीदास के अनुसार रावण सोचता है कि यदि स्वयं भगवान ने अवतार लिया है तो मैं जा कर उनसे हठपूर्वक वैर करूंगा और प्रभु के बाण के आघात से प्राण छोड़कर भव-बन्धन से मुक्त हो जाऊंगा।

RESULT

 

  1. Class 9th Result sheet 10-07-20
  2. Class 11th Result sheet 10-07-20
  3. Class 9th Result sheet with vocational subject UP 10-06-2020
  4. Class 11 Result sheet UPdate 10-06-2020
  5. Class 9th Result sheet update 31-05-20 with vocational subject
  6. Class -11 Result Sheet on 16-05-2020
  7. Class – 9 Result Sheet on 16-05-2020
  8. Class 9 Result sheet in Hindi
  9. Class 9 Result sheet in English
  10. 5th Strank 2020 19-03-2020 mobile version
  11. 5th Strank 2020 19-03-2020
  12. 8th exam strank Mobile sheet
  13. 8th Strank 2020
  14. 10th board satrank sheet
  15. 10th board satrank sheet for Sub. Teacher
  16. 12th board satrank sheet
  17. 12 board satrank sheet Subject teacherwise
  18. 12 board satrank sheet for Subject teacher Mobile version
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    3. 12th Board Exam Seating Plan
    4. 10th Board Exam Seating Plan
    5. 8th Board Exam Seating Plan

श्लोक भावार्थ सहित

1-छिन्दन्ति शस्त्राणि यथा न वारि
स्वेदं सुघर्मो न करोति शुष्कं।
तथा न कान्तिं हरते प्रवात:
शक्नोति सत्यं न मृषा च नष्टुम्।।

जिस प्रकार शस्त्र सब कुछ काट सकते हैं, किन्तु पानी को नहीं।अच्छी धूप सब कुछ सुखा देती है, किन्तु पसीने को नहीं।हवा सब कुछ हर लेती है, किन्तु चमक को नहीं। उसी प्रकार झूठ सब नष्ट कर सकता है परन्तु सच को नहीं।

2- “पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥”
(नीतिशतकम्)

भावार्थ :-
पाप (अहित) कर्मो से हटा कर हित योग्य कर्मो में लगाता है , गुप्त रखने योग्य बातो को छिपाकर गुणों को प्रगट करता है , आपदा के समय जो साथ खड़ा होता है , सज्जनों ने यही सन्मित्र के लक्षण बताये है |

3- विदुर ने अवसर देखकर युधिष्ठिर से पूछा, “वत्स, यदि जंगल में भीषण आग लग जाये, तो जंगल के कौन से जानवर सुरक्षित रहेंगे ?”

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “तात, जंगल में आग लगने पर, स्वछंद और निर्भय घूमने वाले, शेर चीते, हाथी और सबसे तेज भागने वाले हिरण आदि सारे जानवर, जंगल की आग में जलकर राख हो जायेंगे। परन्तु बिलों में रहने वाले चूहे सुरक्षित रहेंगे। दावानल के शांत होने पर वो पुनः बिलों से बाहर निकल कर, शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करेगें.!

“वत्स युधिष्ठिर, तुम्हारे उत्तर से मैं निश्चिंत हुआ। मेरी समस्त चिंतायें दूर हुईं।
जाओ, सुरक्षित रहो। यशस्वी भव। “विदुर ने आर्शीवाद दिया।

4-दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥

जिस प्रकार दीपक अंधकार का भक्षण कर काला धुँआ/ काजल उत्पन्न करता है, वैसे ही हम जिस प्रकार से उपार्जित अन्न ग्रहण करते हैं, हमारे विचार भी क्रमशः वैसे ही बन जाते हैं।

A lamp removes (eats) darkness and produces smoke side by side. Similarly money earned through deceptive/ sinful/ corrupt/unlawful means by an individual makes his mentality alike.

जैसा खाओ अन्न, वैसा होगा मन।

इतने दिवस पूरे हुए, नहीं हुआ रिपु मंद,
अब प्रहार भीषण करें, रहें चाक चौबंद।

5- गृहस्थाश्रम निन्दा

क्रोशन्तः शिशवः सवारि सदनं पङ्कावृतं चाङ्गणं
शय्या दंशवती च रूक्षमशनं धूमेन पूर्णं गृहम् ।
भार्या निष्ठुरभाषिणी प्रभुरपि क्रोधेन पूर्णः सदा
स्नानं शीतलवारिणा हि सततं धिग्धिग्गृहस्थाश्रमम् ।।

जिसके घर पर बालक हमेशा रोदन करते हों, घर पर हर जगह जल गिरा हो ( जल से भरा घर हो ), कीचड़ से भरा आंगन हो, खटमल से भरी खाट हो, भोजन रूखा सुखा हो, घर में चारों तरफ धुआं हो, भार्या ( पत्त्नी ) कठोर वचन बोलने वाली हों, स्वामी ( पति ) क्रोधं से भरा हुआ हो तथा जिस घर मे प्रतिदिन ठंडे पानी से नहाना पडे ऐसे गृहस्थाश्रम को धिक्कार है!

6-काकभुशुण्डि जी ने गरुड़ जी को सन्त के लक्षण बताने के बाद असंत के बारे में बताना शुरू किया——-
असंत— पर दुख हेतु असंत अभागी।
जहाँ सन्त दूसरों को सुख देने को दुःख सहते है, वहीं अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए खुद दुःख सह लेते है।
सन इव खल पर बन्धन करई।
खाल कढाइ बिपत्ति सहि मरई।।
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी।
अहि मूषक इव सुनु उरगारी।।
दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते है और उन्हें बाँधने के लिए अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते है। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए; दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का नुकसान करते है।
यानी यही फर्क होता है सन्त और असंत में– संत दूसरों की खुशी के लिए अपनी खाल उतरवा कर अपनी जान दे देते है परंतु असंत दूसरों को दुःख देने को अपनी खाल उतरवाते है। अर्थात खुद मर जायेंगे पर दूसरों को दुःख जरूर देंगे।
पर संपदा बिनासि नसाहीं।
जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।।
दुष्ट उदय जग आरति हेतु।
जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।
जो असंत होते है वो परायी सम्पति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते है, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते है। दुष्ट की उन्नति प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति संसार के दुःख के लिये ही होती है।
7-क: ज्ञानी ? कश्चाज्ञानी
ज्ञानिन: ददति ज्ञानम् , अज्ञानिनस्तथैव च !
कार्यकाले अवगम्येत् को लग्न: क: पलायित: !
भावार्थ – कौन ज्ञानी हैं कौन अज्ञानी
ज्ञान विद्वान और अज्ञानी दोनो ही देते हैं एक समान देते हैं ! परन्तु ज्ञानी व्यक्ति समय आने पर ज्ञान का उपयोग करते हैं और अज्ञानी ज्ञानाभाव के कारण पलायन कर जाते है !
जयतु संस्कृतं
कृष्णम वन्दे जगत गुरुम

🌲क्षणशः कणशश्चैव विद्यां अर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥🌲

👉 प्रत्येक क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए, क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता।

8-दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः !
सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे !!
भावार्थ-
एक दुर्जन और एक सर्प मे यह अंतर है की साप तभी डंख मरेगा जब उसकी जान को खतरा हो लेकिन दुर्जन पग पग पर हानि पहुचने की कोशिश करेगा
🙏🏻🌻श्याम राधेगोविन्द🌻🙏🏻

9-

;दुर्जनेन समं सख्यं, वैरं चापि न कारयेत्। उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्
दुर्जन दुष्ट, क्रूर, बदमाश व्यक्ति के साथ मित्रता कभी नहीं करनी चाहिए । ऐसे व्यक्तियों के साथ शत्रुता भी नहीं करनी चाहिए । क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में दुर्जन व्यक्ति हमें परेशान करते हैं !

ठीक उसी प्रकार से जैसे कोयला यदि जल रहा हो तो उसे नहीं छूना चाहिए, क्योंकि छूने पर वह हमें जला देता है और यदि ठंडा हो तो भी उसे नहीं छूना चाहिए, क्योंकि छुने पर वह हमें काला कर देता है !

दुर्जनेन सह मित्रतां शत्रुतां वा न कुर्यात्। उभयत्रापि विपत्ति एव भवति ! यथा उष्णः अङ्गारः हस्तं दहति, परन्तु सः अङ्गारः यदा शीतलः भवति तदा पुनः हस्तं मलिनं करोति!!
🌲कृष्णम् वन्दे जगत गुरुम् 🌲

10-बुध्दिर्यस्य बलं तस्य निर्बुध्दैश्च कुतो बलम् !
वने हस्ती मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः !
भावार्थ-
जिसके पास में विद्या है वह शक्तिशाली है. निर्बुद्ध पुरुष के पास क्या शक्ति हो सकती है ? एक छोटा खरगोश भी चतुराई से मदमस्त हाथी को तालाब में गिरा देता है !
❣🙏🏻जय राधे गोविन्द🙏🏻❣

11-हर समय प्रसन्न रहने का परिणाम
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“प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते !!

स्थिरप्रज्ञ के लक्षणों की चर्चा करते हुए योगिराज श्रीकृष्णजी महाराज ने कहा है
समत्वयोग को धारण करने से मनुष्य को निर्मलता प्राप्त होती है। इस निर्मलता के प्राप्त होने पर उस व्यक्ति के दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है!!
🙏🏻🌻कृष्णम् वन्दे जगत गुरुम् 🌻🙏🏻

12-अत्यन्त कोपः कटुका च ,वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरं
नीच प्रसङ्ग: कुलहीन सेवा ,चिह्नानि देहे नरक स्थितानाम्

अत्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणी का होना, निर्धनता, अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना, नीचों की संगति तथा कुल हीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां पृथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है। ’’
🌻❣राधे गोविन्द ❣🌻

13-

योगदर्शन में पांच प्रकार के क्लेश बताए है :—

अविद्या, अस्मिता, राग , द्वेष तथा अभिनिवेश।

इनमें अविद्या ही बाकी चार क्लेशों की जननी है।

(१.) अविद्या :- चार प्रकार की है । एक – नित्य को अनित्य तथा अनित्य को नित्य मानना, शरीर तथा भोग के पदार्थों को ऐसे समझना तथा व्यवहार करना कि जैसे ये सदा रहने वाले हैं। आत्मा, परमात्मा तथा सत्य, न्याय आदि गुणों व धर्म को ऐसा मानना कि जैसे ये सदा रहने वाले नहीं हैं। दुसरा – अपवित्र को पवित्र तथा पवित्र को अपवित्र मानना, नदी , तालाब बावड़ी आदि में स्नान से या एकादशी आदि के व्रत ( फाके ) से समझना कि पाप छूट जाएंगे। सत्य भाषण , न्याय, परोपकार, सब से प्रेमपूर्वक बर्तना आदि में रूचि न रखना। तीसरा – दु:ख के कारण को सुख का कारण तथा सुख के कारण को दु:ख का कारण मानना – काम, क्रोध, लोभ, मोह, शोक, ईर्ष्या, द्वेष तथा विषय वासना में सुख मिलने की आशा करना। प्रेम, मित्रता, सन्तोष, जितेन्द्रियता आदि सुख के कारणों में सुख न समझना। चौथा – जड़ को चेतन तथा चेतन को जड मानना, पत्थर आदि की पूजा ईश्वर पूजा समझना तथा चेतन मनुष्य, पशु , पक्षी आदि को दु:ख देते हुए स्वयं जरा भी महसूस न करना कि जैसे वे निर्जीव हों ।

(२.) अस्मिता- जीवात्मा और बुद्धि को एक समझना अस्मिता है अभिमान के नाश होने पर ही गुणों के ग्रहण में रूचि होती हैं।

(३.) राग – जो जो सुख संसार में भोगे है, उन्हें याद करके फिर भोगने की इच्छा करना राग कहलाता है ।हर संयोग के पश्चात वियोग होता है- जब ऐसा ज्ञान मनुष्य को हो जाता है तब यह क्लेश मिट जाता है।

(४.) द्वेष – जिससे दु:ख मिला हो उसके याद आने पर उसके प्रति क्रोध होता है, यही द्वेष है ।

(५.) अभिनिवेश – सब प्राणियों की इच्छा होती है कि हम सदा जीवित रहे, कभी मरे नही , यही अभिनिवेश है। यह पूर्व जन्म के अनुभव से होता है। मरने का भय मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट , पतंग सभी को बराबर रहता है ।
🙏🏻🌻जय श्याम। राधे 🌻🙏🏻

15-दारिद्र्यनाशनं दान शीलं दुर्गतिनाशनम् !
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी !!
भावार्थ-
दान दरिद्रता को खत्म करता हैं ,अच्छा आचरण, चरित्र दुःख को मिटाता हैं ! विवेक अज्ञान को मिटाता हैं और कार्य की विशद जानकारी भय को दूर करती हैं !
❣🙏🏻जय राधे गोविन्द🙏🏻❣
16-हस्ती हस्तसहस्त्रेण शतहस्तेन वाजिनः !
श्रृड्गिणी दशहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनः !!

हाथी से हजार गज की दुरी रखे.
घोड़े से सौ गज की.दूरी बनाकर रखे
सिंग वाले जानवर से दस गज की. दूरी होनी चाहिए
लेकिन दुष्ट जहाँ हो उस जगह देश/ स्थान से ही निकल जाए इसी में भलाई हैं !
🙏🏻❣ जय राधा माधव ❣🙏🏻

प्रेरक प्रसंग 

पंचतंत्र

“सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम”

जो लोग ज्ञान देने वाले गुरु को ऊंचा स्थान नहीं देते, वे कभी भी सफल नहीं हो सकते ।

प्रभु में विश्वास

जानिए रामायण का एक अनजान सत्य

शास्त्रों ने सेवा के तीन प्रकार बताये हैं

जो रात बीती है उसे क्या कहते हैं इस्लाम में

क्या हनुमान आदि वानर बन्दर थे

 

उत्तम विचार

1-    “आत्मा” में बसे लोगों के पास ही,आपकी  आत्मा को “छलनी” कर देने का सामर्थ्य होता है ।

2- जिस सूरज का सर्दी की ऋतु में बेसब्री से इंतजार होता हैं , उसी सूरज का गर्मी में तिरस्कार भी होता हैं ! आपका महत्त्व तभी है, जब आप किसी के लिए उपयोगी होते हो !
🙏🏻🌻जय राधे गोविन्द🌻🙏🏻

3-जिंदगी का आनंद अपने तरीके से ही लेना चाहिए,लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है।⛳

4-कंटीली झाड़ियो पर ठहरी हुई ओस की बूंदों ने मुझे यह सिखाया हैं ! पत्तो ने साथ छोड़ा तो क्या प्रकृति ने मुझे मोतियों से नवाजा हैं ! ❣राधे कृष्ण राधे गोविन्द❣

5-आइना और दिल वैसे तो दोनो ही बडे नाज़ुक होते है लेकिन,आइने मे तो सभी दिखते है और दिल मे सिर्फ अपने दिखते है।

6-दूसरे की अच्छाई में यकीन होना, खुद में अच्छाई होने का एक अच्छा प्रमाण है..

7-दूसरों के प्रति बुरी भावना” रखने से हम किसी का “बुरा” तो नहीं कर सकते हैं,परन्तु हमारा अंतःकरण”अवश्य मैला” हो जाता है !!

8-🌱जय हरि विष्णु🌱
शांत मन हमारी आत्मा की ताकत है, शांत मन में ही ईश्वर का निवास होता है। जब पानी उबलता है तो हम उसमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख सकते और शांत पानी में हम स्वयं को देख सकते हैं। ठीक वैसे ही ह्रदय जब शांत रहेगा तो हमारी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को हम देख सकते हैं।
🎄जय राधे कृष्ण🎄

9-झूठ कहते हैं कि संगत का असर होता है…आज तक ना काँटों को महकने का सलीका आया, और ना फूलों को चुभना आया….!!!

10-समस्या ये नहीं कि सच बोलने वाले कम हो रहे हैं,सिर्फ अपनी मर्ज़ी का सच सुनने वालों की तादाद बढ़ रही है।

11-💐जीवन में जब उम्मीद की कोई भी किरण शेष न रहे उस स्थिति में भी कोशिश, प्रार्थना और धैर्य इन तीन चीजों का परित्याग नहीं करना चाहिए।

💐कोशिश – ये तो आप सभी ने सुना ही होगा कि
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।।

💐जब आपको लगे कि उम्मीद के सारे दरवाजे बंद हो चुके हैं उस स्थिति में भी आपकी कोशिशें जारी रहनी चाहिए। जिस प्रकार से कभी-कभी गुच्छे की आखिरी चाबी भी ताला खोल देती है, उस प्रकार से अंतिम क्षणों में भी पूरी लगन के साथ किया गया आपका प्रयास बाजी पलट सकता है।

💐जीवन भी एक क्रिकेट मैच की तरह ही है। जिसमें कभी – कभी मैच की आखिरी गेंद पर भी हारा हुआ मैच जीत लिया जाता है।

💐प्रार्थना – जीवन में सदा परिणाम उस प्रकार नहीं आते जैसा कि हम सोचते और चाहते हैं। किसी भी कर्म का परिणाम मनुष्य के हाथों में नहीं है मगर प्रार्थना उसके स्वयं के हाथों में होती है। प्रार्थना व्यक्ति के आत्मबल को मजबूत करती है और प्रार्थना के बल पर ही व्यक्ति उन क्षणों में भी कर्म पथ पर डटा रहता है जब उसे ये लगने लगता है कि अब हार सुनिश्चित है। प्रार्थना में एक अदृश्य शक्ति समाहित होती है। आप प्रार्थना करना सीखिए! प्रार्थना आपको आशावान बनाकर तब भी पूरी शक्ति के साथ आगे बढ़ना सीखाएगी जब आप घोर निराशा से घिरे हुए हों।

💐धैर्य – कितनी भी विकट परिस्थितियां आ जाएं पर मनुष्य को धैर्य का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आप दुखों की घनघोर कालरात्रि से घिरे हों तो धैर्य रखिए! सूर्य की स्वर्णिम किरणों को साथ लेकर एक नया सवेरा जरूर होगा। अगर पतझड़ रुपी प्रतिकूलताएं ही आपको चारों ओर से घेर रखी हों तो धैर्य रखिए! भंवरों की गुंजार और चिड़ियों की चहचहाहट को लेकर एक नया वसंत जरूर आने वाला है।

💐कोशिश करो! प्रार्थना करो और धैर्य रखो! जीवन के परिणाम ही बदल जायेंगे।