श्री हनुमान प्रसाद जांगिड

 श्री हनुमान प्रसाद जांगिड व्याख्याता रा.उ.मा.वि.कुचील

 

 

 


जब यह भारत का वीर आगे बढ़ जाता है

जब यह भारत का वीर आगे बढ़ जाता है
देख मौत भी आगे फिर लौट कभी न आता है

जब यह भारत का वीर आगे बढ़ जाता हैं।
तब कारगिल शिखर भी पाँव तले आ जाता है।।

पुलवामा तो छल था,छल था उरी हमला भी।
जब बढ़े हम आगे तो बालाकोट भी थर्राता है।।

जब कभी कोई हाथी मतवाला हो जाता है
मेरा वीर भी आगे बढ़ खूब तबाही मचाता है

डोकलाम पर न माने,आगे किया नेपाल को
20 बलिदानों पर यह अनगिनत मार जाता है

कश्मीर तो अब पूरा होगा,अब लद्दाख भी होगा
ये अलबेला सोच सोच यही आगे बढ़ जाता है

एक एक वीर हमारा सौ सौ पर भी भारी होता है
चीन पाक सोचो,क्यो पाक बंगदेश हो जाता है।।

हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
17 जून 2020
तेरा बलिदान व्यर्थ न जाएगा

मातृभूमि बलिवेदी पर जो हँसते हँसते बलिदान हो जाएगा।
इस माटी में होगी सुगन्ध तेरी,तेरा बलिदान व्यर्थ न जाएगा।।

अनीति मार्ग जो धारित कर अब कोई कितना आगे बढ़ पायेगा।
लिपट तिरंगे से धर्म विजय पाने का तेरा बलिदान व्यर्थ न जाएगा।।

शांत अपने चितवन से ये वीर शस्त्र अस्त्र न पहले कभी उठाएगा ।
मातृभूमि वीर पथ बलिदान हुआ तू तेरा बलिदान व्यर्थ न जाएगा।।

हर भारतवासी कहता हैं कब मातृभूमि पर मिटने का अवसर आएगा।
माँ भारती पर बलि हुए उन वीरों संग तेरा बलिदान व्यर्थ न जाएगा।।

हरि ॐ
मेरे प्यारे सैनिक

मेरे प्यारे सैनिक बलिदान आज हुए है।
भारत मातृ भूमि के वो सरताज हुए हैं।।

छोड़ गए वो स्वास, है कर्तव्य निभाया
भारती के वो आँखों के तारे आज हुए है।।

शत्रु के हाथों हम पर कितने वार हुए है ।
गलवान घाटी के पत्थर पावन आज हुए है।।

आहिंसा परम् धर्म हमारा,हर सम्मान दिया
घात सह बलिदानी वो सबके नाज हुए है।।

करगिल हो पुलवामा हो या हो डोकलाम
मातृभूमि रक्षा को बलिदानों के काज हुए है।।

सत्य और निष्ठा को धारित तत्पर सदा रहे है
मानव थे वो पहले किन्तु देवतुल्य आज हुए है।।

हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
17 जून 2020
शिक्षक हूँ मैं

इस कल्पतरु कलम रूपी तलवार में बहुत धार हैं।
किन्तु राजधर्म उपेक्षाओं के आगे बहुत लाचार है।।
दिया जाता है काज कोई भी,सहर्ष ही स्वीकार हैं।
छूटता कुछ नहीं यहाँ,शिक्षक का यहीं व्यवहार हैं।।
फलों से लदा वट ज्यों विनम्र होकर झुक जाता है।
समाज,राष्ट्र हित नत मस्तक हो शीश झुकाता हैं।।
युगों से जो निज जीवन न्योछावर करता आया है।
दुर्योधन हो या अर्जुन, अंतर कभी न दिखाया है ।।
लोकतंत्र का प्रहरी बन, जन, पशु तक गिनता है।
क्यो रह जाए अशिक्षित कोई, घर घर फिरता है ।।
कोरोना महामारी में धर्म,अर्थ और तन अर्पित है ।
अजान भले व्याधि से, किन्तु कर्तव्य मुखरित है ।।
शिक्षक हूँ आदि काल से, वाल्मीकि,वेदव्यास हूँ ।
एकलव्य के लिये आधार हूँ द्रोण सा लाचार हूँ ।।
मरण काल तक कर्तव्य, "कलाम"सा सम्मान है ।
"सर्वपल्ली"के स्वप्नों पर शिक्षक को अभिमान है।।


हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
26 अप्रैल 2020
कोरोना को तेरे आगे हारना है

अभी सोचना क्यों खुद से ज्यादा
खुद से ज्यादा सोच तू पायेगा क्या
मौत बट रही है घर के बाहर
बाहर जाकर तू मरना चाहेगा क्या
हर रोज देख ले भीतर अपने
बाहर जहान से भला तू पायेगा क्या
चलने दे खुल के साँसे अपनी
कुछ और सोच मरना चाहेगा क्या
भगवान देख लेंगे बाकी सब
बाहर शेखी बगार मौत घर लाएगा क्या
माना दम तेरा घुटता होगा
ये खुद को देखने का मौका नहीं है क्या
बाहर कुछ तेरे हितेषी होंगे
सोच समझ लाठी उनकी खायेगा क्या
बूँद बूँद से घड़ा भर जाता है
तू बाहर जाकर जल छलका आएगा क्या
कौन कहेगा फिर रूकने की
सोच जिम्मेदारी से फिर रूक पायेगा क्या
कोरोना को तेरे आगे हारना है
"हरि ॐ"बीतने के बाद कोई समझाए क्या


हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
अजमेर
26 अप्रैल 2020
तेरा हुक्म सर आंखों पर,हम तो अब भी रख लेंगे साहिब।
मजदूर तो हैं हम और फिर मजबूर भी तो है साहिब ।।

मेरे चूल्हे की लो बुझ रही,हिंदू मुसलमा तो बंद करो साहिब।
किसी की जाति,ईमान अलग, मजहब का खेल क्यों साहिब।

मरती मानव जाति पर भेद भाव, ठीक नहीं है साहिब।
अंदर से कुरेदो तो भूख एक जैसी ही निकलेगी साहिब ।।

वो बैठे ऊँचे शिखरों पर,बस मजबूरों को बहकाते साहिब।
हमें काहे दण्ड उनका, मुश्किल पेट हम पालते साहिब।।

घर जाना हैं मिलना है अपनो से फिर लौट आवेंगे साहिब।
हमारी पीर अपनी समझो तब ही तो तुम समझोगे साहिब।।

भारत गौरव की महिमा को आज पुनः बनावो साहिब।
"हरि ॐ"का स्वप्न हर घर समृद्धि दीप जलाओ साहिब।।


हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
अजमेर
मौत आने तो दो

मौत आएगी हमे भला तो आने तो दो,
ये भी दुनियाँ का दस्तूर है निभाने तो दो,
वो गुजर तो जाएँ मेरे जनाजे को देखकर,
बस एक यही यकीन ही मुझे आने तो दो।।

आफताब रोज आता है चाँद रह न पाता है,
चाँदनी के सितारे वो चमक में छुपाता है
मेरे यकीन मखोल तो तू कोई और हुआ
जनाज़े की ईद पर आज चाँद आने तो दो।।

साँसे रूकेगी,धड़कने टूटेगी,बेजान होंगे तो
हिलेंगे नहीं,हंसेगे नहीं,रोएँगे नहीं,सच जाने तो
या तो वो गम चूर होंगे,या हमसे दूर होंगे
"हरि ॐ"मौत मज़ा या सज़ा,मौत आने तो दो।।

हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
अजमेर
9928875100
11 मार्च 2020
आ अब कहाँ फसे
निज कृत्यों से आज मानव खुद ही फँसे ।
प्रसन्न हुआ यमलोक और यमराज हँसे ।।
हो स्वारथ वशीभूत विपदा तू खुद ही लाया।
अब पछतावे के शूल क्यों न हृदय तेरे धँसे।।

विधाता ने तो तुझे खान पान सम्मान है दिया ।
तूने सब कुछ त्याग केवल विषपान है किया ।
क्या मनाने को देव अब तू अधिकारी रहा
जो छेड़े विषधर देव तो अब वो क्यों न डसे।।

करे प्रीति विपरीत तो हर कोई औंधा गिरे।
आये विनाश काल तो सद्बुद्धि फिरे।
लांघी तूने खाई खोद अब तूने कुआ दिया
सूझे न उपाय "हरि ॐ"आ अब कहाँ फँसे।।

हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
अजमेर
11 मार्च 2020
काफिला गुजर गया
कोई करके वादा न जाने कब मुकर गया।
जाने कब हक़ीक़त का काफिला गुजर गया।।

यकीन नहीं अब भी क्यों कोई इतर गया।
देखते रहे हम और काफिला गुजर गया।।

यादों में उनकी आंखों में अश्क़ ठहर गया ।
रुकना नसीब न था जो काफिला गुजर गया।।

आज क्यों गुलाबों का वो सूर्ख रंग उतर गया ।
अजीब किस्सों सा वक़्त काफिला गुजर गया।।

चलती सांसों से क्या कोई दुनियाँ में ठहर गया।
चलती सांसो के इश्क़ का काफिला गुजर गया।।

शहर ठहरा गाँव ठहरा,जो मरा नहीं ठहर गया।
मुझे रोके कितना,पिछलों का काफिला गुजर गया।।

मेरा तेरा क्या है यहाँ जो तू देखने को ठहर गया।
"हरि ॐ"से पहले इश्क़ का काफिला गुजर गया।।


हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
16 मार्च 2020
मेरा प्यारा परिवार

नीम कट गया,
आँगन बंट गया,
खड़ी हो गई एक दीवार।

विस्तार लुट गया,
विश्वास लुट गया,
छोटा हो गया ये संसार।

भाई गया,
भाईचारा गया,
रह गई तो केवल तकरार।

बचपन गया,
रिश्तों से स्नेह गया,
कमा कमा करते जीवन पार।

माँ का ममत्व गया,
पिता का स्वामित्व गया,
बदला अपनों का व्यवहार।

खेत बिक गया,
गाँव से गया,
शहरों मैं मानव बना व्यापार।

पड़ोस गया,
सन्तोष गया,
नहीं रह गया कुछ आरपार।

केवल "मैं" रह गया
"हम"न रह गया
न रहा मेरा प्यारा परिवार।

हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
अजमेर
निज हित है सब किया

किसने किसका अच्छा किया किसने किसका बुरा किया।
दुनियादारी है यहाँ,जो किया अपने ही हित में है किया।।

अंधकार था कुछ दिखा नहीं तो दीपक उसने जल दिया
अंधकार अब छट आया तो दीपक उसने ही बुझा दिया।।

एक माता ही निश्वार्थ थी जिसने हमको जनम दिया
उसी गर्भ से जाया भाई आँगन हिस्सों में बटा दिया।।

एक बीज से सेरों उगाता खेतों को स्वार्थ में माता बता दिया
भरा पेठ,अब पैसा देख तूने उसका ही अब सौदा किया

मृत्यु सत्य कौन भला जानता नहीं,किसने उसे धोखा दिया
क्या ले जाता साथ है,किन्तु नाम खातिर ही सब है किया।

निश्वार्थ पंछियो ने भी अपना कोई स्वार्थ तो है पूरा किया
परमपिता परमेश्वर की लीलाओं को ही पूरित है किया।।

गौ,वृक्ष,मातापिता,गुरुवर,सरिता,सविता,वायु और दिया
मानव ही है जो कुछ करता नहीं,किया जो निज स्वार्थ किया।।

हरि ॐ
हनुमान प्रसाद जांगिड़
9928875100
11 मार्च 2020